जोहार देवघर, 22 जनवरी। झारखंड के देवघर (Deoghar) स्थित बाबा बैद्यनाथ के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम है। बाबा बैद्यनाथ द्वादश ज्योर्तिलिंग में सर्वश्रेष्ठ हैं। इनके दरबार से कोई खाली हाथ नहीं जाता है। जैसे बाबा बैद्यनाथ सर्व पूजनीय हैं, वैसे ही यहां के अनुष्ठान भी विशेष महत्व रखते हैं। वसंत पंचमी पर तिलक उत्सव भी उसी में एक है। वसंत पंचमी पर बाबा बैद्यनाथ का तिलक उत्सव होता है, जिसमें मिथिलांचल के लोग बड़े उत्साह से शामिल होते हैं।
इसे भी पढ़ें - बाबा बैद्यनाथ धाम की अनोखी महिमा, शिव-शक्ति के दिव्य मिलन से पूरी होती है हर मनोकामना
बाबा बैद्यनाथ का पारंपरिक तिलक उत्सव...
इस साल भी वसंत पंचमी को लेकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा है। मिथिलांचल के इन कांवरियों को तिलकहरू कहा जाता है। इनके आगमन से हर तरफ महादेव के नाम की गूंज सुनाई दे रही है। सभी औघड़दानी 'बाबा बैद्यनाथ' की भक्ति में जुटे हुए हैं। शुक्रवार को बसंत पंचमी है। इसी दिन बाबा बैद्यनाथ का पारंपरिक तिलकोत्सव मनाया जाएगा। इस अवसर पर बाबा का तिलक और अभिषेक किया जाएगा।
तिलक उत्सव सिर्फ एक अनुष्ठान भर नहीं
तिलक उत्सव के साथ ही बाबा मंदिर गर्भगृह और परिसर में अबीर-गुलाल भी उड़ाया जाएगा। इस दौरान पूरा बाबाधाम उत्सव में डूब जाता है। यह सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं है। इस परंपरा की जड़ें माता पार्वती और देवाधिदेव महादेव के विवाह से जुड़ी हुई हैं। बाबा बैद्यनाथ मिथिला के दामाद और माता पार्वती मिथिलांचल की बेटी हैं। महाशिवरात्रि पर होने वाले पार्वती और शिव के विवाह से पहले बसंत पंचमी के पावन दिन बाबा का तिलक होता है।
इसे भी पढ़ें- साल 2026 में पांच पवित्र स्नान, मकर संक्रांति से प्रारंभ, कार्तिक पूर्णिमा पर संपन्न
मिथिलांचल से बड़ी संख्या में तिलकहरू पहुंचे
तिलक उत्सव की परंपरा को निभाने के लिए मिथिलांचल के श्रद्धालु देवघर आते हैं। वे जल चढ़ाते हैं, तिलक करते हैं और देवाधिदेव महादेव से आशीर्वाद भी मांगते हैं। इस साल भी तिलक उत्सव के लिए बाबा के 'ससुराल' मिथिलांचल से बड़ी संख्या में तिलकहरू देवघर पहुंचे हैं। इनमें दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, पूर्णिया, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मधेपुरा, मुंगेर और नेपाल की तराई के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवघर पहुंच चुके हैं।
दामाद के घर में ठहरने से तिलकहरू को परहेज
बाबा बैद्यनाथ धाम के तीर्थ पुरोहित प्रभाकर शांडिल्य बताते हैं, ''बड़ी संख्या में तिलक उत्सव में आए तिलकहरू होटलों, लॉज या आश्रम में नहीं ठहरते हैं। मान्यता है कि दामाद के घर ठहरना उचित नहीं होता। बड़ी संख्या में भक्त सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल आए हैं। 108 किलोमीटर की कठिन यात्रा पूरी की है। रास्ते भर नचारी और वैवाहिक गीत गूंजते रहे। मंदिर जाने के रास्ते में हर कदम पर 'बोल बम' की अहर्निश गूंज सुनाई दे रही है।
तिलक उत्सव में बाबा को पहली फसल की भेंट
प्रभाकर शांडिल्य ने आगे बताया, ''तिलक उत्सव में बाबा को पहली फसल की बाली चढ़ाई जाती है। उन्हें विशेष भोग भी लगाया जाता है। इसके बाद अबीर-गुलाल से उत्सव मनाया जाता है। मिथिलांचल में इसी दिन से होली का आगमन हो जाता है। बाबा पर श्रृंगार पूजा से पहले फुलेल भी चढ़ाया जाता है। जबकि, लक्ष्मी नारायण मंदिर में तिलक की विधि संपन्न होती है। इसके 25 दिन बाद महाशिवरात्रि पर शिव-पार्वती विवाह होता है।
-----समाप्त-----