जोहार देवघर, 22 दिसंबर। ‘देघरे बिराजे गौरा साथ, बाबा भोलानाथ’, यह पंक्ति बाबा बैद्यनाथ की महिमा को अपने आप में समेटे हुए है। झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि श्रद्धा और संस्कार का जीवंत स्वरूप है। इसे कामनालिंग, आत्मालिंग और हृदयापीठ भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
शिव-शक्ति का पावन संगम
दरअसल, देवघर वह पवित्र स्थल है जहां माता सती का हृदय गिरा था और उसी स्थान पर भगवान शिव शिवलिंग रूप में विराजमान हैं। इसी कारण बाबा बैद्यनाथ धाम शिव और शक्ति दोनों का केंद्र माना जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में भी बाबा बैद्यनाथ की महिमा का विशेष उल्लेख मिलता है, जो इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ाता है।
महाशिवरात्रि की अनूठी परंपराएं
महाशिवरात्रि पर देवघर पूरी तरह शिवमय हो जाता है। यहां चतुष्प्रहर पूजा की विशेष परंपरा निभाई जाती है, जो देश के अन्य शिव धामों में दुर्लभ है। रातभर चलने वाली पूजा में शिव विवाह की पूर्ण विधि संपन्न होती है। इस दिन बाबा को सिंदूर अर्पित किया जाता है और मोर मुकुट चढ़ाया जाता है।
मोर मुकुट और विवाह बाधा निवारण
मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर बाबा को मोर मुकुट अर्पित करने से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। खासकर अविवाहित युवक-युवतियों के लिए यह परंपरा बेहद फलदायी मानी जाती है। इस दिन बाबा का सामान्य श्रृंगार नहीं होता, बल्कि विवाह संस्कार को ही सर्वोच्च स्थान दिया जाता है।
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शिव बारात का भव्य उत्सव
महाशिवरात्रि पर देवघर में निकलने वाली शिव बारात आस्था का सबसे बड़ा उत्सव होती है। बच्चे, बूढ़े, युवा, महिलाएं—हर वर्ग इसमें शामिल होता है। मान्यता है कि स्वयं देवता भी इस बारात के साक्षी बनते हैं। दूर-दराज से आए श्रद्धालु शिव बारात में शामिल होकर खुद को सौभाग्यशाली मानते हैं।
बाबा बैद्यनाथ की कामनालिंग मान्यता
बाबा बैद्यनाथ धाम के तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, बाबा शिव ध्यानस्थ रहते हैं, जबकि माता सती सदैव जागृत रहती हैं। जब भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं, तो माता सती उसे बाबा तक पहुंचाती हैं। यही कारण है कि बाबा बैद्यनाथ को कामनालिंग कहा जाता है और यहां मांगी गई हर प्रार्थना स्वीकार होती है।
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