जोहार रांची, 17 जनवरी। झारखंड भारत के उन राज्यों में शामिल है, जहां आज भी आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपराएं और संघर्ष जीवित हैं। ऐसे में अब फिल्ममेकर्स ने इन कहानियों को फिल्म और डॉक्यूमेंट्री के जरिए धीरे-धीरे बड़े पर्दे पर सामने लाने की कोशिश की है। दरअसल, आदिवासियों के जीवन, उनके संघर्ष और प्रकृति के साथ उनके जुड़ाव पर कई फिल्में बनाई गई हैं। इन फिल्मों ने दर्शकों को आदिवासी जीवन की वास्तविकता, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष की एक झलक दिखाई है।
शोमैन राजकपूर और शक्ति सामंत का झारखंड से खास कनेक्शन
झारखंड हमेशा से बॉलीवुड और दूसरी भाषाओं के लिए खास विषय रहा है। शोमैन राजकपूर ने कई प्रसिद्ध फिल्मों का निर्माण किया और उनकी फिल्में देश-विदेश में भी सराही गई। बहुत कम लोगों को पता है कि राजकपूर का झारखंड से बेहद खास रिश्ता रहा है। राजकपूर के एक फाइनेंसर हेमेन गांगुली झारखंड की राजधानी रांची के निवासी थे। हेमेन गांगुली ने रांची में प्लाजा, रतन टॉकीज और रूपाश्री नाम के तीन सिनेमा हॉल का निर्माण कराया था। जबकि, रांची महिला महाविद्यालय के निकट सामंत विला बंगला का कनेक्शन मशहूर निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत से रहा। शक्ति सामंग 'हावड़ा ब्रिज', 'आराधना', 'कटी पतंग', 'अमर प्रेम' जैसी सफल फिल्मों से जुड़े रहे।
प्रकाश झा, शत्रुघ्न सिन्हा और अमिताभ बच्चन का रिश्ता
अगर झारखंड के फिल्म निर्माताओं की बात करें तो इसमें विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी और मोहन जी प्रसाद का नाम भी प्रमुख है। इसी प्रकार प्रकाश झा की 'हिप हिप हुर्रे', शत्रुघ्न सिन्हा-अमिताभ बच्चन का 'कालिया' भी झारखंड से जुड़ाव रखता है। इनके अलावा झारखंड के अनीस रंजन भी जाना-पहचाना नाम हैं, जो 'कैश' और 'दिल पे मत ले यार' जैसी फिल्मों से प्रोड्यूसर के रूप में जुड़े रहे। हाल ही में ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ एक बेहद खास फिल्म बनी है। यह फिल्म झारखंड की एक आदिवासी महिला के जीवन को दिखाती है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़ा काम करती है। फिल्म आदिवासी दर्शन और आधुनिक तकनीक के बीच के संबंध को प्रस्तुत करती है।
झॉलीवुड में झारी समेत कई भाषाओं में फिल्म निर्माण
झारखंड का सिनेमा झॉलीवुड के नाम से जाना जाता है। यहां मूल रूप से झारी भाषा में फिल्मों का निर्माण होता है। इसके अलावा खोरठा और संथाली भाषा में भी फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है। इन फिल्मों का भी अपना दर्शक वर्ग है, जो पूरे उत्साह के साथ इन फिल्मों को देखता है। झारखंड सरकार के अनुसार, प्रथम नागपुरी चलचित्र सोना कर नागपुर था, जो 1994 में प्रदर्शित हुआ। इसका निर्माण धनंजय सिंह ने किया। समय बदलने के साथ झारखंड की फिल्में और डॉक्यूमेंट्री को देश-दुनिया में पहचान मिलने लगी। आज के समय में 'ये धरती हमारी' आदिवासियों के शोषण और उनके अधिकारों के संघर्ष की कहानी बयां करती है।
इन फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री ने जीत लिया दुनिया का दिल
डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘झरिया’ पद्मश्री सम्मानित सिमोन उरांव के कार्यों पर आधारित है। इसमें झारखंड के आदिवासी इलाकों में जल संकट और जल संरक्षण के प्रयासों को दिखाया गया है। कुडुख भाषा में बनी ‘एड़पा काना’ है, जो आदिवासी सिनेमा की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इस फिल्म को बेस्ट ऑडियोग्राफी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। ‘बिरहोर : ट्राइब्स ऑफ झारखंड’ बिरहोर जनजाति और उनके जीवन को दिखाती है, जबकि ‘टेलिंग पॉन्ड’ झारखंड के आदिवासी समुदायों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर आधारित है। कुछ और प्रमुख फिल्में हैं, जैसे ‘कोसा : द आदिवासी स्टोरी’, जो तसर सिल्क और आदिवासी समुदाय की कहानी को दर्शाती है। वहीं, ‘एक बटे दो’ एक आदिवासी परिवार की कहानी है, जो एक अनाथ बच्ची को गोद लेकर उसकी शिक्षा और पालन-पोषण के लिए संघर्ष करता है।
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