जोहार रांची, 20 दिसंबर। झारखंड भारत के उन राज्यों में शामिल है, जहां आज भी आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपराएं और संघर्ष जीवित हैं। ऐसे में अब फिल्ममेकर्स ने इन कहानियों को फिल्म और डॉक्यूमेंट्री के जरिए धीरे-धीरे बड़े पर्दे पर सामने लाने की कोशिश की है। दरअसल, आदिवासियों के जीवन, उनके संघर्ष और प्रकृति के साथ उनके जुड़ाव पर कई फिल्में बनाई गई हैं। इन फिल्मों ने दर्शकों को आदिवासी जीवन की वास्तविकता, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष की एक झलक दिखाई है।
इसी बीच हाल ही में 'ह्यूमन्स इन द लूप' एक बेहद खास फिल्म बनी है। यह फिल्म झारखंड की एक आदिवासी महिला के जीवन को दिखाती है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़ा काम करती है। फिल्म आदिवासी दर्शन और आधुनिक तकनीक के बीच के संबंध को आसान और संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करती है। साथ ही ये दिखाती है कि परंपरा और तकनीक एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक साथ आगे तक चल सकते हैं।
आदिवासियों के शोषण को बयां करती हैं 'ये धरती हमारी'
दूसरी फिल्म 'ये धरती हमारी' आदिवासियों के शोषण और उनके अधिकारों के संघर्ष की कहानी बयां करती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर आदिवासी समुदायों को लगातार लड़ाई लड़नी पड़ती है और ये फिल्म आदिवासियों के हक की आवाज बनकर सामने आती है।
डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'झरिया' पद्मश्री सम्मानित सिमोन उरांव के कार्यों पर आधारित है। इसमें झारखंड के आदिवासी इलाकों में जल संकट और जल संरक्षण के प्रयासों को दिखाया गया है। फिल्म यह समझाती है कि किस तरह स्थानीय ज्ञान और सामूहिक प्रयास बड़े बदलाव ला सकते हैं।
'एड़पा काना' में दिखा है सामाजिक मुद्दों की सच्चाई
कुडुख भाषा में बनी 'एड़पा काना' है, जो आदिवासी सिनेमा की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इस फिल्म को बेस्ट ऑडियोग्राफी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। ये आदिवासी जीवन, उनकी भाषा और सामाजिक मुद्दों को बेहद सच्चाई के साथ पेश करती है।
इसके अलावा, 'बिरहोर : ट्राइब्स ऑफ झारखंड' बिरहोर जनजाति और उनके जीवन को दिखाती है, जबकि 'टेलिंग पॉन्ड' झारखंड के आदिवासी समुदायों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर आधारित है।
साथ ही कुछ और प्रमुख फिल्में हैं, जैसे 'कोसा : द आदिवासी स्टोरी', जो तसर सिल्क और आदिवासी समुदाय की कहानी को दर्शाती है। वहीं, 'एक बटे दो' एक आदिवासी परिवार की कहानी है, जो एक अनाथ बच्ची को गोद लेकर उसकी शिक्षा और पालन-पोषण के लिए संघर्ष करता है। झारखंड के आदिवासियों पर बनी ये फिल्में सिर्फ एंटरटेनमेंट तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर भी करती हैं।
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