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विशेष : श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लिए वैचारिक तपस्या का केंद्र था मधुपुर

विशेष : श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लिए वैचारिक तपस्या का केंद्र था मधुपुर

जोहार देवघर, 20 दिसंबर। मधुपुर के आज और कल को समेट कर देखा जाए तो कई ऐतिहासिक तथ्य उभरकर सामने आ जाते हैं। इनमें से जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का मधुपुर से गहरा जुड़ाव यादगार है। उनके बलिदान दिवस पर उनकी यादें ताजा हो जाती है।

युवा साहित्यकार और शोधार्थी उमेश कुमार बताते हैं डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर के सवाल पर सन 1951 ईस्वी में मधुपुर से ही निकले थे। उन्हें विदा देने मधुपुर के वरिष्ठ पत्रकार भोला सर्राफ सहित अनेक गणमान्य लोग मधुपुर जंक्शन पर पहुंचे थे। यह उनकी अंतिम विदाई थी।

अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने धारा 370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की थी। वह कहे थे या तो वे देश को भारतीय संविधान प्राप्त करायेंगे या अपना बलिदान देंगे। वह अपने संकल्प को पूरा करने सन 1953 ईस्वीं में बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें नजरबंद कर लिया गया।

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23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु से मधुपुर सहित देश के उनके शुभचिंतकों को भावनात्मक चोट लगी थी। इतिहासकार उमेश कुमार बताते हैं कि शहर के शेखपुरा मोहल्ला से जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का गहरा लगाव था। श्यामा प्रसाद के पिता प्रसिद्ध शिक्षाविद और बंगाल के ख्याति प्राप्त न्यायाधीश सर आशुतोष मुखर्जी ने 1904 में मधुपुर के जमींदार रायबहादुर विजय नारायण कुंडू से शेखपुरा मौजा में 12 बीघा जमीन खरीद कर भव्य कोठी का निर्माण करवाया था।

कोठी का नामकरण अपने पिता के नाम पर गंगा प्रसाद हाउस रखा। बाद में कोठी के पश्चिम और 4 बीघा का प्लॉट भी खरीद लिया। उनकी इच्छा थी कि वहां मधुपुर कॉलेज का निर्माण हो। लेकिन 1 अप्रैल 1912 में बंगाल अलग होकर बिहार में आ गया। सियासी बदलाव में उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई। उनके पुत्र डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मधुपुर को अपनी वैचारिक तपस्या का केंद्र बनाया।

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