जोहार मधुपुर, 23 दिसंबर। अब मधुपुर में तांगे पर बाबू भैया नहीं चलते। जब मोटर वाहन नहीं था, तो लोग इसी के सहारे अपनी मंजिल तय करते थे। एक जमाने में तांगा यहां की लोकप्रिय सवारी थी। 20-25 वर्ष पहले मधुपुर में 100 से अधिक तांगे चलते थे। जो अब सिमट कर महज 4-5 रह गए हैं।
बंगाली सैलानियों का मिनी हिल स्टेशन मधुपुर जैसे धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक मनोरंजक पहचान खोता जा रहा है। वैसे ही तांगा चालकों का रोजगार छिंनता गया । कभी मधुपुर का मीठा पानी, शांतिप्रिय लोग, गंगा- जमुनी संस्कृति, प्रदूषण रहित वातावरण, नदी, जोरिया, झरना झाड़ी जंगल भरा मनोरंजन स्थल मधुपुर की खास पहचान थी। लेकिन यहां की प्रकृति और संस्कृति टूटने बिखरने से अस्तित्व पर संकट है।
तांगा की सवारी और बाजार हाट का जुड़ाव पुराना था। मधुपुर में तांगा वह लुप्तप्राय होने के कगार पर है। कमर मंजिल रोड के तांगे वाले कहते हैं इनकी हालत दयनीय है। पहले बंगाली बाबू वर्धमान मिष्ठान का संदेश मिठाई,बंसी महाराज का राजभोग, रबड़ी ,रसमलाई, मामाजी के दुकान की छेनामुर्की, प्रकाश का चाट, पाठक का कचौड़ी, कोल्हा का डोसा, गांधी चौक की लस्सी, हटिया से सब्जी, मांस, मछली लेकर तांगा पर सवार होते थे। बावनबीघा, सपहा, शेखपुरा, बड़बाद, पत्थरचपटी में उनकी दर्जनों बड़ी-बड़ी कोठियां थी।
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तांगा से ही सैलानी कोठी आना-जाना करते थे। बकुलिया झरना, पथरौल और फागो काली मंदिर समेत मनोरंजक स्थल भी तांगे से ही लोग जाते थे। तांगा चालक सलीम कहते हैं कि लोग पहले गांधी चौक के पास ही तांगा लगाया करते थे। वहां से हटने के बाद स्टेशन परिसर में तांगा लगाना शुरू हुआ। अब तो मुश्किल से परिवार चल रहा है।
कोरोना काल ने तो तांगा चालकों की कमर तोड़ कर ही रख दी। अब तो घोड़े के खाने के लिए भी पैसा नहीं जुड़ता है। भूखमरी से बचने के लिए लोग तांगा छोड़कर मजदूरी करने को विवश हुए हैं।अक्टूबर से फरवरी तक बंगाली सैलानियों से कुछ आमदनी होती थी। अब तो सैलानी भी मधुपुर से मुंह मोड़ने लगे हैं। कोरोना के कारण सैलानियों का आवागमन बहुत कम हो रहा है।
(वरिष्ठ पत्रकार बाबूलाल जी )